तू है इस जहां,
मैं यह जानता हूं मेरे लिए..।
जैसे सागर के किनारे हो ,
नाव से बिछड़े मछेरा के लिए ..।
तू है इस जहां, मैं यह जानता हूं मेरे लिए ..
वहीं सागर के किनारे पर,
जैसे लिखा हो नाम तेरा..।
वहीं आसमां में बादल पर,
जैसे छिपा हो पैगाम तेरा..।
बस यूँही चाहत अपनी,
जता रहा हूं तेरे लिए..।
तू है इस जहां, मैं यह जानता हूं मेरे लिए..।
चाहा तुझे चाहत से,
दिलों-दिल जान से..।
जैसे चाहा था रांझे,
पुन्नू और महिवाल ने..।
अब करता हूंँ इजहार,
मोहब्बत का तेरे लिए..
तू है इस जहां, मैं यह जानता हूं मेरे लिए..।
माना तू परम है ,
पर्वत-ए-प्यार की..।
मै भी 'सागर' कहलाता हूं,
दिलवाले समंदर का..।
बस इस तरह से मोहब्बत,
जता रहा हूं तेरे लिए..।
तू है इस जहां, मैं यह जानता हूं मेरे लिए..।
जैसे सागर के किनारे हो ,
नाव से बिछड़े मछेरा के लिए ..
तू है इस जहां, मैं यह जानता हूं मेरे लिए..
'परम' (4th Para & 1st Line)= सर्वोच्च एवं शिखर
By: सागर लक्ष्य {Adv. Sagar Lakshyaa}
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