क्या हम सच में "व्यवस्था परिवर्तन" चाहते हैं?
यह सच है कि भारत एक संघीय राष्ट्र है। इस राष्ट्र में बहुत सारी विभिन्नताएं हैं, जो इसे दूसरे देशों से भिन्न करती है। इसी विभिन्नता भरे भारत में बहुत सारे आंदोलन जहां देश को (भारतीय गोरों के द्वारा विदेशी गोरों अर्थात अंग्रेजों से) आजा़द करवाने के लिए हुए वहीं भारतीय गोरों की गुलामी से आजादी दिलवाने के लिए भी हुए।
इस बात से अब सब परिचित ही हैं कि भारत में अछूतों की गुलामी की तस्वीर अफ्रीका के लोगों की गुलामी से भी भयानक थी। इसी भयानक और जिल्लत भरी गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हर वर्ग के महान लोगों ने कड़ी मेहनत की। अगर हम इन महान लोगों को शुरुआत से पहचानने की कोशिश करें तो बहुत सारी शख्सियतों का जिक्र आएगा, जिन्होंने अपना जीवन भारतीय अछुतों की दशा और दिशा को सुधारने में लगा दिया। लेकिन, इसका नतीजा हुआ क्या? अछुतों को एक अलग धर्म मिला। जिसमें हलाकि हिंदू धर्म जैसी छुआ छात तो नहीं थी लेकिन यह इसके प्रभाव से वंचित भी नहीं था। नतीज़तन, धर्म तो बदल हो गया लेकिन जाति-पाति और छुआछूत नहीं।
इसका उदाहरण यही है कि अछुतों के गुरुद्वारे, मस्जिद और बहुत सारे धर्म स्थल मूल धर्म से अलग है। इन सारी बातों से यही प्रश्न पैदा होता है कि "क्या धर्म परिवर्तन ही पूर्ण: व्यवस्था परिवर्तन है? क्या इस समाज से अलग हो जाना ही परिवर्तन है? या फिर क्या हम सच में परिवर्तन चाहते हैं की नहीं?
अगर आप ऊपर दिए तीनों प्रश्नों में से पहले दो के जवाब 'नहीं' और तीसरे प्रश्न का जवाब 'हाँ' में देते हैं, तो मैं आपको बताना चाहता हूं कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी ऐसा ही परिवर्तन लाना चाहते थे। क्योंकि उन्होंने जाति-पाति और छुआछूत का कड़वा स्वाद चख रखा था । इसी कड़वे स्वाद ने उन्हें रातों को सोने नहीं दिया। वह जहां हिंदू धर्म की भयानक जाति-पाति और छुआछूत से लड़ने के लिए संघर्षशील थे वहीं दलितों के अंधविश्वास से परेशान भी थे। शायद मूल रूप से यही कारण रहे होंगे, उनके बुद्ध धर्म में जाने के। लेकिन, "क्या यही व्यवस्था परिवर्तन था?" नहीं, यह धर्म परिवर्तन तो हो सकता है लेकिन "व्यवस्था परिवर्तन" तो हो ही नहीं सकता और ना ही था।
तो व्यवस्था परिवर्तन है क्या? आज भारत में बहुत से ऐसे संस्थान है, जहां व्यवस्था परिवर्तन करना बहुत जरूरी हो गया है। जिसमें शिक्षा और राजनीतिक प्रशासन पहले स्थान पर है। अब इस प्रश्न के उत्तर का मूल जानने के लिए डॉ अंबेडकर के जीवन के कुछ अंशों को समझना होगा। पहला, जब उन्होंने वंछित वर्ग को प्राकृतिक संसाधनों को इस्तेमाल करने के लिए आंदोलन किए। दूसरा, जब डॉक्टर अंबेडकर ब्रिटिश सरकार में बेहतरीन स्कालर और भारतीय मूलनिवासीयो के एकलोते नेता एवं प्रतिनिधि के रूप में राजनीति में प्रख्यात हुए।
वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए एकलोते प्रतिनिधि के रूप में :--
हालांकि आज भारत में सामाजिक वातावरण के मायने बदल गए हैं, और संबंधित लोग इस संदर्भ में बहुत जागरूक भी हुए हैं। ऐसा होना आवश्यक भी था। क्योंकि डॉक्टर अंबेडकर ने सभी भारतीयों को समान अधिकार जो दिए हैं। इन सभी अधिकारों का नए संविधान में मौजूद होने के पीछे डॉक्टर अंबेडकर के जीवन के बहुत सारे अनुभवों का प्रभाव है।
पहली घटना, जिसमें डॉक्टर अंबेडकर के स्कूल के दिनों की गोरेगांव की यात्रा महत्वपूर्ण है। डॉक्टर अंबेडकर और उनके भाई ने एक बैलगाड़ी किराए पर ली। क्योंकि वह अपने पिता को गोरेगांव जाकर देखना चाहते थे। रास्ते में डॉक्टर अंबेडकर और उनके भाई को प्यास लगी और इसी दौरान बेल गाड़ी चालक को एहसास हुआ कि दोनों बालक जात से अछूत है। उसने दोनों बालकों को बाहर की ओर फेंका और जमकर कोसा। बेल गाड़ी चालक का गुस्सा अंबेडकर और उनके भाई ने दुगना किराया देकर शांत किया। गाड़ी चालक फिर भी गाड़ी के पीछे पीछे चला और सारे राह में अंबेडकर के बड़े भाई को ही गाड़ी चलानी पड़ी। क्योंकि चालक को अशुद्ध होने का डर जो था। इस सारे रास्ते में डॉक्टर अंबेडकर और उनके बड़े भाई को पानी के बिना प्यासे ही रहना पड़ा।

दूसरी घटना भी एक ऐसी ही है। जिसने अंबेडकर के जीवन में गहरा घाव जड़ दिया। जब डॉक्टर अंबेडकर और उनका परिवार अपनी जरूरत के हिसाब से खाना साथ लेकर अंबेडकर जी के पिताजी रामजी राव को मिलने गए। तब उन दिनों हिंदूयों के द्वारा किसी अछुत को पानी तक देना घोर पाप माना जाता था। अंबेडकर के परिवार के पास खाना तो था। लेकिन खाना तैयार करने के लिए पानी नहीं था। ना ही अंबेडकर का परिवार किसी दूसरे से पानी लेने की हिम्मत कर सका। इस घटना ने बालक अंबेडकर के दिल और दिमाग पर गहरा प्रभाव डाला।
तीसरी घटना भी कुछ ऐसी ही है। यह घटना उस स्कूल की है, जहां बालक अम्बेडकर पढ़ने जाते। वहां उनको पानी के नल को छूने का अधिकार नहीं था।प्यास लगने पर स्कूल के चपरासी को बुलाना पड़ता था और जब चपरासी आस पास नहीं होता था, तो प्यासे ही रहना पड़ता था।
यह वह घटनाएं हैं, जिनका डॉक्टर अंबेडकर के जीवन पर गहरा प्रभाव हुआ और उन्होंने इन्हीं वंचित अधिकारों के लिए कई आंदोलन किए। जिसमें "महाड सत्याग्रह" महत्वपूर्ण आंदोलन था। इस आंदोलन ने ही "व्यवस्था परिवर्तन" का बीज बोया। महाड सत्याग्रह महाराष्ट्र के एक छोटे कस्बे में 20 मार्च 1927 को डॉक्टर अंबेडकर के नेतृत्व में हुआ। डॉ अंबेडकर ने अपने हाथों में चावदार (वाटर टैंक) से पानी लिया और बाकी के आंदोलनकारियों ने भी ऐसा ही किया ओर अपने हाथों से पानी पिया।

यही वह क्रांतिकारी आंदोलन था, जिसने सदियों से वंचित वर्ग को अपनी शक्ति का एहसास दिलाया। यह आंदोलन डॉक्टर अंबेडकर के लिए ना कि सिर्फ क्रांतिकारी विद्रोह था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था। जिसने अछूतों को पानी तक के इस्तेमाल जैसे प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से वंचित किया था। क्योंकि भारत के दलितों के पास प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल करने का अधिकार भी नहीं था। उन्हें सुबह के वक्त बाहर निकलने का हक भी नहीं था। उनके घर गंदे नालो के पास होते थे और आज भी हैं। डॉक्टर अंबेडकर की शादी भी रात को नाले के पास हुई। दलितों के पास सिर ढकने के लिए और अपना जीवन यापन करने के लिए अपनी जमीन तक नहीं थी। आज भी बहुत से दलितों के पास अपनी जमीन नहीं है। इन सभी रुकावटों के बावजूद डॉक्टर अंबेडकर आगे बढ़ते गए।
डॉक्टर अंबेडकर ने बहुत सारे आंदोलन किए, जिनसे ना कि दलितों बल्कि भारत के सभी वंचित वर्गों और गरीबों को नए भारत का सपना डॉक्टर अंबेडकर के रूप में साकार होते हुए नजर आने लगा। और हुआ भी ऐसा ही। नए भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों को दर्ज करना ही बहुत बड़ी बात थी। भारत की धरती पर जिन अछुतों को नगर के आस पास तक रहने का अधिकार नहीं था उन्हें नगर के बीचो-बीच रहने का अधिकार प्राप्त हुआ। सदियों से नदी और कुएं के पानी के इस्तेमाल करने के अधिकार से वंचित अछुतों को इन संसाधनों पर न्यायिक अधिकार प्राप्त हुआ। इतना कुछ ही नहीं डॉक्टर अंबेडकर भारत की औरतों के अधिकारों से भरा हिंदू कोड बिल लाना चाहते थे। जो भारत की औरतों के प्रति सिंकुड़ी मानसिकता का नाशक साबित होता।लेकिन इस बिल का विरोध लगातार जातिवादी और उच जातीय नेताओं ने कड़वे शब्दों में किया। यही वह "व्यवस्था परिवर्तन" था, जो डॉक्टर अंबेडकर ने लाना चाहा।
डॉक्टर अंबेडकर द्वारा औरतों को दिया गया महत्त्व उनके एक कथन से पता लगाया जा सकता है। "I Measure The Progress of Society By The Degree of Progress Which Women Have Achieved." किसी भी समाज की तरक्की को उस समाज की औरतों की तरक्की से मापा जाना, हिंदू इतिहास में पहली बार हुआ था। ऐसे ही एक दूसरे कथन में वह कहते हैं कि, "Relationship Between Husband And Wife Should Be One Of The Closest Friend." खुद हिंदू औरतों को भी हिंदू धर्म में इज्जत और सम्मान नहीं मिलता था। इतना ही नहीं औरतों को पति के पैर की जूती के समान समझा जाता था।
डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा एक पत्नी के रिश्ते को आदर सहित महत्व देना उन दिनों बहुत बड़ी बात थी। आज के भारत की नारी शक्ति के प्रोत्साहन की गाथा डॉक्टर अंबेडकर से शुरू होती है। हलाकि ज्योति राव फुले जी की धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले जी का भारत की पहली महिला अध्यापिका के रूप में बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसी योगदान ने अंबेडकर जी के जीवन में महिला सशक्तिकरण के लिए प्रयास करने का बीज बोया। यही वह शुरुआत थी जो आजाद भारत के इतिहास में उत्तराखंड प्रांत के चिपको आंदोलन में भी देखने को मिली। यह महिला सशक्तिकरण था। जिसकी नींव ज्योति राव फुले जी ने रखी। लेकिन नींव पर खड़ी इमारत डॉक्टर अंबेडकर की ही थी। यह "व्यवस्था परिवर्तन" था, जो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी चाहते थे।
ब्रिटिश सरकार में बेहतरीन स्कालर एवं भारतीय मूलनिवासीयो के एकलोते नेता के रूप में:--
डॉ भीमराव अंबेडकर जी को 1926 में मुंबई विधान परिषद के लिए मनोनीत किया गया और 11 वर्ष बाद मुंबई विधान सभा के लिए मुंबई नगर से अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। इन्हीं घटनाओं के प्रभाव में डॉक्टर बी आर अंबेडकर के राजनीतिक और आंदोलनकारी जीवन की शुरुआत हुई। जिसमें नए भारत के संविधान में सुरक्षा उपायों (Safety Measures) के मुद्दों पर एम. के. गांधी से मतभेद होना एक महत्वपूर्ण घटना है।

भारत के अल्पसंख्यको (Religious Minorities People) का आग्रह था कि भारतीय स्वराज के अधीन उनकी स्थिति को सुरक्षा प्रदान की जाए। इसके साथ ही विधानमंडलो (Legislature) के मंत्रीयो के अोहदो में विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए। कांग्रेस के प्रतिनिधि के नाते गोलमेज कांफ्रेंस में गांधी मुस्लिमों के अलावा और किसी की भी ऐसी मांग को स्वीकार नहीं करना चाहते थे।
अब यह संप्रदायक मसला बन चुका था। जिस पर एक समान सहमति होनी जरूरी हो गई थी। यह प्रथम गोलमेज कांफ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधि संप्रदायक मामले के नतीजे थे, जिनका ना तो कोई हल हुआ और ना ही कोई आम सहमति बन पाई। बेशक़, यह मसला आम सहमति बन पाने के करीब आ गया था। लेकिन, गांधी के प्रतिनिधियों की आलोचना का शिकार होने लगा।
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First Round Table Conference
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दूसरे गोलमेज सम्मेलन के समापन पर भी गांधी के द्वारा इतना मनमुटाव पैदा कर दिया गया था, कि आपसी सहमति और सुुलह का कोई रास्ता ही नहीं रहा। हालांकि, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने मध्यमार्ग अपनाते हुए, अछुतों के लिए संप्रदायिक शर्तों पर अगस्त 1932 को निर्णय देने की घोषणा की। क्योंकि, महामहिम की सरकार चाहती थी कि सर्वसहमति से संप्रदायिक मसलों का जल्दी हल हो जाए।

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Second Round Table Conference
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लेकिन, गांधीजी 11 मार्च 1932 के 'सर सैमुअल होर' को लिखे अपने पत्र में दलित वर्गों के लिए "पृथक निर्वाचक मंडल" (Separate Electoral College) की व्यवस्था का विरोध कर चुके थे। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के फैसले के खिलाफ 20 सितंबर 1932 को आमरण अनशन करने की जानकारी सरकार को लिखे अपने एक पत्र में दे दी। और फिर, गांधी जी ने अपना अनशन शुरू भी कर दिया। इस साम-दाम-दन्ड-भेद वाली चाल से डॉक्टर अंबेडकर जी धर्म संकट में फंस गए। ऐसी गंभीर स्थिति में जहां एक तरफ बाबासाहेब अम्बेडकर के लोगों का अधिकार पड़ा था तो दूसरी तरफ गांधी के प्राण पड़े थे। सदियों का संताप भोग रहे दलित जाति एक बार फिर साजिश का शिकार होने जा रही थी। अब, इसका नतीजा यह हुआ कि, डॉक्टर अंबेडकर ने मानवता की पुकार को सुना और गांधी जी के प्राणों की रक्षा की।
डॉक्टर अंबेडकर अब इस बात पर सहमत हो गए कि संप्रदायिक निर्णय में उसी प्रकार संशोधनों से नियम बना दिए जाएं जैसा कि गांधीजी चाहते हैं। इसी समझौते को पुन प्रकट का नाम दिया गया। पूना पैक्ट के समझौते के अनुसार अब अछुतों को "प्रांतीय विधान सभा" (Provincial Legislative Assembly) के "निचले सदन" (Lower House) के निर्वाचन (Elections) में आरक्षित सीटें मिली। असल में, इस समझोते पर गांधी जी द्वारा सहमत हो जाना सिर्फ स्वर्ण हिंदुओं को फायदा पहुंचाना था, ना कि दलितों के उत्थान का प्रयास करना था।
भले ही डॉक्टर अंबेडकर जी पूना पैक्ट समझौते पर गांधी जी के साथ सहमत हो गए थे। लेकिन, वह भारत के मूलनिवासियों को पूना पैक्ट जैसा आरक्षण नहीं देना चाहते थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा भारत के संविधान में जो मौलिक अधिकार भारत के नागरिकों को, खास तौर पर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और भारत की प्रत्येक महिला को प्रदान किए गए हैं, वह किसी आरक्षण से कम नहीं है। नए भारत के लिए प्रत्येक महिला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को जो अधिकारों और सुरक्षा उपायों की जरूरत थी, इन सबको ध्यान में रखते हुए डॉक्टर अंबेडकर जी ने स्वराज भारत के संविधान की रचना की। यही वह रचना थी जिसने "व्यवस्था परिवर्तन" किया। अब भारत, भारत के लोगों का 'भारत' बना।
1937 में, भारत सरकार एक्ट 1935 के अनुसार डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के द्वारा बनाई गई "इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी" ने 17 सीटों में से 14 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की। यह जीत, पूंजीवाद के ऊपर गरीबों और मजदूरों की जीत थी।
इस जीत के बाद, मजदूरों के लिए डॉक्टर अंबेडकर ने बहुत सारे कार्य किए। जिसमें, मजदूरों द्वारा की जाने वाली 'हड़ताल' के अधिकार के खिलाफ पेश किए गए कानूनी बिल का डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा कड़े शब्दों में विरोध भी किया गया शामिल है। फिर डॉक्टर अंबेडकर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में मजदूर सदस्य के रूप में सन 1942 से 1946 तक बहुत सारे कार्य किए। 'इन कार्यों का स्वरूप नए भारत के संविधान में और श्रमिक कानून में भी देखा जा सकता है।' इससे पहले सन 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में डॉक्टर अंबेडकर जी ने अहम भूमिका निभाई। डॉ अंबेडकर द्वारा भारत के नागरिको को ऐसा दृष्टिकोण और दिशा निर्देश दिए जाना ही अपने आप में "व्यवस्था परिवर्तन" था।
निष्कर्ष, एक संकल्प....
डॉक्टर बी आर अंबेडकर जी के इन सभी घटनाक्रमों को एक तरफ रख कर, हम यह सोचे कि अगर डॉक्टर अंबेडकर ने भारत के संविधान में अधिकारों और सुरक्षा उपायों की रचना करने की बजाय किसी अलग और हिन्दू धर्म से मुक्त एक नए धर्म की रचना कर देते तो क्या आज सभी दलित जातीया और इन सभी के साथ साथ आम वर्ग की औरतें जो आजादी से अपना जीवन यापन करके अपना विकास कर रही है, क्या उन्हें यह आज़ादी मिल पाती?
'धर्म' का अपना एक महत्व है। लेकिन, बाबासाहेब के द्वारा संविधान में जो अधिकार डाले गए हैं वह सभी धर्मों से श्रेष्ठ है। "इन अधिकारों की श्रेष्ठथा का यही कारण है, कि डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान में आजादी से धर्म को मानने और अपनाने का भी अधिकार दिया, ना की, इन धर्मो ने संविधानिक अधिकारों का। और ना ही यह पुरातन धर्म कभी एसे संविधानिक अधिकार दे पाते। यही था "व्यवस्था परिवर्तन"।
यह आजादी बहुत लंबे संघर्ष से मिली है। आपको यह आजादी देने का यही मकसद रहा है, कि आप इस देश के शासन में भागीदार बनें। क्योंकि बाबा साहेब ने कहा है कि "साधारण लक्ष्य रखना गुनाह है। आंदोलन का लक्ष्य महान ही होना चाहिए।"
बाबा साहेब डॉक्टर अंबेडकर जी का आप सभी के नाम एक आखरी पैगाम :
जो कुछ मैं कर पाया हूँ वह जीवन भर मुसीबतें सहन करने करके और विरोधियों से टक्कर लेने के बाद ही कर पाया हूँ। जिस कारवां को आप यहां देख रहे हैं, उसे में अनेक कठिनाइयों से यहां लेकर आ पाया हूँ। अनेक अवरोध जो इसके मार्ग में आ सकते हैं, के बावजूद इस कारवां को आगे बढ़ते रहना चाहिए। "अगर मेरे अनुयाई इसे आगे ले जाने में असमर्थ रहे, तो उन्हें इसे यहीं पर छोड़ देना चाहिए जहां पर यह अब है। पर किसी भी परिस्थितियों में इसे पीछे नहीं हटने देना चाहिए। मेरी जनता के लिए मेरा यही संदेश है।"
तो साथियों, "अब व्यवस्था परिवर्तन आपके हाथों में है।"
सागर लक्ष्य एडवोकेट
Keep it up.... Lakshya sir
ReplyDeleteThank you my dear.
Deleteवाह मेरे भाई पूर्ण रूप से सहमत हूं आपके विचारों से।
ReplyDeleteThank you so much Ji..
DeleteGood Work Sagar.... Keep it going.
ReplyDeleteThank you so much.. 😊
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